`उत्तर प्रदेश ने बीते वर्षों में जिस तरह की प्रगति की है, वह अपने आप में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है। आज स्वयं उपमुख्यमंत्री भी इस बात की ओर ध्यान दिला रहे थे कि जब मौजूदा सरकार ने कार्यभार संभाला था, तब प्रदेश में सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बेहद सीमित थी, जबकि निजी संस्थानों की भरमार थी। सरकारी अस्पतालों की हालत चिंताजनक थी और स्वास्थ्य सेवाएं लगभग बदहाल स्थिति में थीं।
उस दौर में आम जनता को इलाज के लिए भटकना पड़ता था। बीमार लोग तड़पते रहते थे और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता था। अखबारों और मीडिया में अक्सर यह खबरें आती थीं कि किसी “अज्ञात बीमारी” से कई लोगों की जान चली गई। हैरानी की बात यह थी कि वह बीमारी वर्षों तक अज्ञात ही बनी रही।
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एक जनप्रतिनिधि के तौर पर इस स्थिति के खिलाफ संघर्ष करना पड़ा। यह लड़ाई सड़कों से शुरू होकर संसद तक पहुँची और काफी लंबे समय तक चली। निरंतर प्रयासों और मजबूत इच्छाशक्ति के बल पर आज यह कहना संभव है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित प्रदेश के 38 जिलों में इंसेफेलाइटिस जैसी घातक बीमारी को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।
यह इस बात का प्रमाण है कि सरकार की मंशा साफ है और उसकी नीतियाँ स्पष्ट हैं। जब शासन की योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव और पूरी ईमानदारी से अंतिम व्यक्ति तक पहुँचता है, तो वह हर वह बदलाव संभव हो जाता है जिसकी उम्मीद एक आम नागरिक करता है। पहले लोग सवाल उठाते थे कि इतनी खराब परिस्थितियों में सुधार कैसे होगा, लेकिन विश्वास के साथ कहा गया था कि हालात बदलेंगे — और आज वह बदलाव साफ दिखाई दे रहा है।“