नए कपड़ों की चमक के पीछे छिपी डरावनी कहानी जिसे जानकर आपका दिमाग पूरी तरह से हिला जाएगा

दुनिया में कपड़ों के निर्यात की बात हो तो बांग्लादेश आज एक बड़ी ताकत बन चुका है। यूरोपीय संघ में बेचे जाने वाले हर तीन में से एक टी-शर्ट बांग्लादेश में ही तैयार होती है। अमेरिका को डेनिम (जींस वाला कपड़ा) भेजने में भी यह देश दुनिया में सबसे आगे है।
सस्ते कपड़ों की वजह से ग्राहक खुश, रिटेलर खुश और फैक्ट्री मालिक भी मुनाफे में—लेकिन इस चमक के पीछे एक गहरी समस्या छिपी है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है।

WhatsApp Group Join Now
Telegram Group Join Now

पानी की बढ़ती खपत और पर्यावरण पर भारी असर

कपड़ा बनाने की प्रक्रिया में बहुत ज्यादा पानी लगता है।

  • कपड़ा धोने
  • रंगने
  • साफ करने
    हर चरण में पानी की खपत बेहद अधिक होती है।

उदाहरण:

  • 1 किलो डेनिम को धोने के लिए लगभग 250 लीटर पानी चाहिए।
  • 1 किलो सूती कपड़े को रंगने और धोने में 200 लीटर पानी लगता है।

इन्हीं कारणों से केवल बांग्लादेश की टेक्सटाइल फैक्ट्रियां हर साल लगभग 1500 अरब लीटर पानी खर्च करती हैं।
इतने पानी से ढाका की लगभग दो करोड़ आबादी 10 महीनों तक अपनी जरूरतें पूरी कर सकती है।

भूजल स्तर का लगातार गिरना

ज्यादातर फैक्ट्रियां अपनी जरूरत का पानी भूजल से निकालती हैं
परिणाम यह हुआ कि जिन इलाकों में कपड़ा फैक्ट्रियां ज्यादा हैं, वहां भूजल का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

कृषि अधिकारी मोहम्मद वहीदुल इस्लाम बताते हैं कि राजधानी ढाका के पास स्थित कई गांवों में पिछले 20 सालों में भूजल बेहद नीचे जा चुका है।
2008 में जब उन्होंने बोरवेल (ट्यूबवेल) लगाया, तो पहले की तुलना में और गहरी खुदाई करनी पड़ी—करीब 27 मीटर तक।

2011 से 2021 के बीच हुए एक अध्ययन में साफ दिखा कि जहां-जहां फैक्ट्रियों की संख्या ज्यादा है, वहां पानी का स्तर और तेज़ी से गिरा है।

नई तकनीकें मदद तो करती हैं, पर सब फैक्ट्रियां तैयार नहीं

कुछ फैक्ट्रियां अब आधुनिक तकनीक अपनाने लगी हैं ताकि पानी की खपत कम हो सके।
सोहानूर तालुकदार, जो ढाका गारमेंट्स एंड वॉशिंग लिमिटेड में काम करते हैं, बताते हैं कि नई मशीनें काफी मदद कर रही हैं, जैसे:

1. ओजोन मशीन

यह मशीन हवा से ऑक्सीजन खींचकर उसे ओजोन में बदल देती है।
ओजोन कपड़ों को फेड (हल्का) करने का काम करता है और इसमें पानी की जरूरत नहीं होती।

2. एक-से-एक अनुपात वाली धुलाई मशीनें

पहले 1 किलो कपड़ा धोने में 20 लीटर पानी खर्च होता था।
अब नई तकनीक के कारण वही काम 1 लीटर पानी में हो जाता है।

लेकिन समस्या यह है कि हर फैक्ट्री इतनी महंगी मशीनों में निवेश करने के लिए तैयार नहीं है।
जो कंपनियां निवेश कर रही हैं, वे इसे अपने भविष्य के लिए जरूरी मान रही हैं।
उन्हें उम्मीद है कि इससे न केवल पर्यावरण की रक्षा होगी बल्कि उनके बिज़नेस के लिए भी यह फायदेमंद साबित होगा।

कपड़ा उद्योग की पूरी संरचना पर उठ रहे सवाल

कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि समस्या केवल पानी की खपत की नहीं है—बल्कि पूरी दुनिया के कपड़ा उत्पादन और खपत के तरीके पर सवाल उठना चाहिए।
आज लोग सस्ते कपड़े खरीदते हैं, कुछ ही बार पहनते हैं और फिर फेंक देते हैं।
इस आदत की वजह से उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, और उसी के साथ पानी की खपत भी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई केवल एक देश की समस्या नहीं है।
कपड़ा उद्योग पूरी तरह वैश्विक है, इसलिए समाधान भी वैश्विक स्तर पर ही ढूंढना होगा।
अगर किसी एक देश ने सख्त नियम लागू किए, तो कंपनियां उत्पादन को दूसरी जगह ले जाएंगी—क्योंकि ग्राहक ज्यादा कीमत देने को तैयार नहीं होते और कंपनियों का मुनाफा भी दांव पर होता है।

निष्कर्ष: कपड़ा उद्योग को पर्यावरण के अनुकूल बनाना ही भविष्य

बांग्लादेश की कपड़ा उद्योग दुनिया को सस्ते कपड़े देता है, लेकिन इसकी कीमत पर्यावरण चुका रहा है।
पानी की खपत कम करने, नई तकनीकों को अपनाने और टिकाऊ फैशन की ओर बढ़ने की जरूरत है।
अगर सही कदम समय पर नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पानी की समस्या और गंभीर हो जाएगी।

Leave a Comment