साथियों,
श्री गुरु रविदास जी के जन्म को आज 600 वर्षों से भी अधिक समय बीत चुका है। यानी छह सदियां।
उस दौर को याद कीजिए—भारत ने एक के बाद एक विदेशी आक्रमण, हिंसा, और अस्थिरता का सामना किया।
एक तरफ बाहरी हमले थे, तो दूसरी तरफ समाज के भीतर गहरी चुनौतियां थीं।
ऐसे कठिन और संघर्षपूर्ण समय में काशी की पावन भूमि पर संत रविदास जी का जन्म हुआ।
उन्होंने न सिर्फ समाज को जगाया, बल्कि मानवता को एक नई दृष्टि दी।
उन्होंने कहा—
“एक माटी के सब भांडे, सभा का एक सिरजनहार।
रविदास व्यापे एक घट भीतर, सबको एक कुम्हार।”
अर्थात, हम सब एक ही मिट्टी से बने हैं और हमें गढ़ने वाला भी एक ही कुम्हार है।
यह संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं था, बल्कि समानता, एकता और मानवीय गरिमा का उद्घोष था।
समाज में नई चेतना का संचार
साथियों,
श्री गुरु रविदास जी की शिक्षाओं से समाज में नई चेतना का उदय हुआ।
भारत ने अपनी कमजोरियों को पहचानना शुरू किया और उन्हें दूर करने का साहस भी पाया।
पंजाब की धरती पर भी लाखों लोगों ने संत रविदास जी के दिखाए मार्ग को अपनाया,
उनके आदर्शों और उपदेशों को अपने जीवन का हिस्सा बनाया।
बेगमपुरा: एक आदर्श समाज की कल्पना
साथियों,
संत रविदास जी ने भारत को भविष्य की एक महान संकल्पना भी दी—
उस संकल्पना का नाम था “बेगमपुरा”।
उन्होंने कहा—
“बेगमपुरा शहर की नाऊ,
दुख अंदोह नाही तह ठाऊ।
ना तस खिराजू, ना मालू खफू,
ना खाता, ना तरसु जवाल।”
यानी, एक ऐसा नगर—
जहां कोई दुखी न हो,
कोई वंचित न हो,
न किसी पर कर का बोझ हो,
न भय हो, न भेदभाव।
हालांकि इन शब्दों के गहरे आध्यात्मिक अर्थ हैं,
लेकिन यह एक आदर्श समाज और व्यवस्था की स्पष्ट रूपरेखा भी प्रस्तुत करते हैं।
विकसित भारत और संत रविदास की प्रेरणा
साथियों,
मुझे संतोष है कि आज़ादी के इतने दशकों बाद,
भारत अब मिशन मोड में संत रविदास जी की इस संकल्पना को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
इस मिशन का नाम है—विकसित भारत।
विकसित भारत यानी—
- ऐसा भारत, जहां कोई गरीबी में जीने को मजबूर न हो
- ऐसा भारत, जहां हर व्यक्ति को सम्मान मिले
- ऐसा भारत, जहां हर नागरिक को आगे बढ़ने के समान अवसर हों
और मुझे पूरा विश्वास है कि
संत रविदास जी के आशीर्वाद से,
हम विकसित भारत के इस लक्ष्य को अवश्य प्राप्त करेंगे।
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