आज के दौर में जब वैश्विक और आंतरिक परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं, राष्ट्र की अखंडता को लेकर एक गंभीर विमर्श की आवश्यकता है। यह समझना बेहद जरूरी है कि राष्ट्र की मजबूती और हमारी सांस्कृतिक जड़ों (सनातन) का अस्तित्व एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि राष्ट्र की शक्ति क्षीण होती है, तो हमारी पहचान और अस्तित्व पर संकट खड़ा होना अनिवार्य है।
विभाजनकारी शक्तियों से सावधान
समाज में जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर विभाजन पैदा करने वाली ताकतें सक्रिय हैं। हमें यह समझना होगा कि जब संकट आता है, तो ये संकुचित पहचानें कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करतीं। जो लोग समाज को इन आधारों पर बांटने का प्रयास कर रहे हैं, उनके इरादों के प्रति सतर्क रहना हर नागरिक का कर्तव्य है।
वैश्विक घटनाओं से सीख: चुप्पी के मायने
वर्तमान में पड़ोसी देशों, विशेषकर बांग्लादेश की स्थितियों पर गौर करना आवश्यक है। वहां से आने वाली खबरें विचलित करने वाली हैं, जहां प्रतिदिन मानवीय संवेदनाओं को झकझोरने वाली घटनाएं घट रही हैं।
- मानवाधिकारों पर मौन: आश्चर्य की बात यह है कि इन अमानवीय घटनाओं पर वैश्विक संगठन और कई राजनीतिक दल मौन धारण किए हुए हैं।
- चुनिंदा संवेदनाएं: जब पीड़ित एक विशेष समुदाय या दलित हिंदू होता है, तो अक्सर मानवाधिकारों की वकालत करने वाली आवाजें थम जाती हैं। कुछ धार्मिक संस्थाओं और संगठनों को छोड़कर, एक बड़ा वर्ग इस पर चुप्पी साधे हुए है।
एकता ही सुरक्षा का मार्ग है
इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज बंटा है, तब-तब उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी है। विभिन्न राजनीतिक वादों और जातिगत समीकरणों के बहकावे में आकर अपनी एकता को खंडित करना देश के दुश्मनों के मंसूबों को सफल बनाने जैसा है।
“बंटने का अर्थ है असुरक्षा के द्वार खोलना।” अतः, देश के दुश्मनों की नजरों से बचने का एकमात्र रास्ता यह है कि हम किसी भी प्रकार के आंतरिक विभाजन से बचें और एक सूत्र में पिरोए रहें।
उभरता भारत: एक नई महाशक्ति
चुनौतियों के बावजूद, भारत आज एक सही दिशा में अग्रसर है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश ने विकास की एक लंबी और गौरवशाली यात्रा तय की है। भारत अब ठहरने वाला नहीं है, बल्कि एक बड़ी वैश्विक यात्रा के लिए स्वयं को तैयार कर रहा है। आज भारत दुनिया की एक ऐसी शक्ति बनने की ओर अग्रसर है, जिसे अब कोई भी बाहरी ताकत रोकने में सक्षम नहीं है।
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निष्कर्ष
राष्ट्र की प्रगति का मार्ग एकता और जागरूकता से होकर गुजरता है। हमें संकीर्ण विचारधाराओं से ऊपर उठकर राष्ट्र प्रथम की भावना को अपनाना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सशक्त और सुरक्षित भारत का निर्माण हो सके।