RRS ने 1400 साल पुराने मंदिर को तुड़वाया अपने निजी फायदे के लिए जनता को पता चलते ही बचाने निकले घरों से

दिल्ली में एक 1400 साल पुराने मंदिर को तोड़े जाने की खबर ने पूरे देश में चर्चाओं को जन्म दे दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दावा किया जा रहा है कि यह मंदिर इसलिए गिराया गया क्योंकि पास ही स्थित आरएसएस मुख्यालय के लिए पार्किंग की जरूरत थी। इस दावे को लेकर भारी विवाद खड़ा हो गया है, और हर तरफ से सवाल उठ रहे हैं कि आखिर अपनी ही धार्मिक विरासत को तोड़ने की नौबत क्यों आई?

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मंदिर गिराने का आरोप और उठते सवाल

वीडियो शेयर करने वाले लोग आरोप लगा रहे हैं कि जिस मंदिर में वर्षों से भक्त आते रहे, जिसकी सेवा पीढ़ियों से होती रही — उसे एक झटके में ढहा दिया गया। वीडियो में दिखाया गया है कि मंदिर के ठीक बगल में आरएसएस की बिल्डिंग है, और दावा किया गया कि पार्किंग विस्तार के लिए इस प्राचीन मंदिर को हटाया गया।

इस घटना पर आलोचकों का कहना है कि जो लोग खुद को धर्म और हिंदू आस्था के ठेकेदार बताते हैं, वही अपने फायदे के लिए मंदिरों तक पर बुलडोजर चला रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब मस्जिदों के नीचे मंदिर खोजने की राजनीति करने वाले नेता इस मुद्दे पर खामोश हैं, तो आखिर इसकी वजह क्या है?

विपक्ष और इतिहासकारों की तीखी प्रतिक्रिया

इस विवाद पर कई इतिहासकारों और नेताओं ने भी नाराज़गी जताई है।
इतिहासकार अशोक कुमार पांडे का कहना है कि अगर संघ को वास्तव में मंदिरों से प्रेम होता, तो 1400–1500 साल पुराने मंदिर को सिर्फ पार्किंग के लिए नहीं तोड़ा जाता। उनके शब्दों में, “मंदिर इनके लिए श्रद्धा का स्थान नहीं, बल्कि राजनीति का केंद्र है।”

कांग्रेस नेताओं ने भी कहा है कि हिंदुओं की भावनाओं का ठेका लेने वाले लोग ही आज मंदिर गिराने के आरोपों में घिर गए हैं। उनका सवाल है — क्या हिंदू आस्था सिर्फ चुनावी मौसम में ही याद आती है?

मीडिया की चुप्पी पर भी सवाल

कई लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि जिन मुद्दों पर मीडिया घंटों बहस करता है, वही मीडिया अब इस वीडियो पर चुप है। जब मस्जिद से जुड़ी कोई खबर आती है तो डिबेट शो से लेकर प्राइम टाइम तक उसी विषय पर चर्चाएं होती हैं, लेकिन दिल्ली में 1400 साल पुराने मंदिर के गिराए जाने पर एक शब्द भी नहीं बोला जा रहा। आलोचकों का कहना है कि यह चुप्पी सत्ता के दबाव और चुनिंदा मुद्दों पर ही बोलने की आदत को दिखाती है।

क्या धर्म राजनीति का औजार बन चुका है?

इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है — क्या धर्म आज सिर्फ राजनीति का साधन बन कर रह गया है?
जिन लोगों ने मंदिर-मस्जिद के मुद्दों पर देश को बांटने की कोशिश की, वही लोग अब मंदिरों को भी “विकास” की आड़ में हटाते दिख रहे हैं।

कई लोगों का कहना है कि यह सिर्फ एक मंदिर का मामला नहीं है, बल्कि यह दिखाता है कि सत्ता की राजनीति में आस्था कितनी पीछे छूट गई है।

बुलडोजर की राजनीति और बदलता दौर

पिछले वर्षों में बुलडोजर राजनीतिक प्रतीक बन चुका है। पहले इसका इस्तेमाल गरीबों की बस्तियों पर होता दिखा, फिर कथित अवैध निर्माण हटाने के नाम पर। लेकिन अब जब बुलडोजर मंदिरों तक पहुंच गया है, तो लोगों के मन में असुरक्षा और गुस्सा दोनों हैं।

अंतिम सवाल: मंदिर-मस्जिद की राजनीति कब तक?

लोगों का कहना है कि जिन्हें हिंदू धर्म का रक्षक माना जाता है, वही अगर मंदिर गिराने के आरोपों में फंसें तो फिर सच क्या है?
क्या धर्म सिर्फ वोट का साधन बनकर रह गया है?
क्या मंदिरों का सम्मान भी राजनीति के आगे छोटा पड़ गया है?

यह विवाद अभी भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय है, और लोग जवाब मांग रहे हैं कि राजधानी में सदियों पुरानी धार्मिक धरोहर को गिराने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

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